श्रीमद् भगवद् गीता – श्लोक, अर्थ और श्रीकृष्ण की शिक्षाएँ
श्रीमद् भगवद् गीता के सभी 18 अध्याय और 700+ श्लोक: संस्कृत पाठ, उच्चारण, शब्दार्थ, भावार्थ और जीवन-शिक्षा हिंदी, English और ગુજરાતી में।
अध्याय
- अध्याय 1: अर्जुनविषादयोग
- अध्याय 2: सांख्ययोग
- अध्याय 3: कर्मयोग
- अध्याय 4: ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
- अध्याय 5: कर्मसंन्यासयोग
- अध्याय 6: आत्मसंयमयोग
- अध्याय 7: ज्ञानविज्ञानयोग
- अध्याय 8: अक्षरब्रह्मयोग
- अध्याय 9: राजविद्याराजगुह्ययोग
- अध्याय 10: विभूतियोग
- अध्याय 11: विश्वरूपदर्शनयोग
- अध्याय 12: भक्तियोग
- अध्याय 13: क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग
- अध्याय 14: गुणत्रयविभागयोग
- अध्याय 15: पुरुषोत्तमयोग
- अध्याय 16: दैवासुरसम्पद्विभागयोग
- अध्याय 17: श्रद्धात्रयविभागयोग
- अध्याय 18: मोक्षसंन्यासयोग
आज का श्लोक
अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम् ।
जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् ॥
हे महाबाहु! यह (आठ प्रकार वाली) मेरी अपरा, अर्थात् निम्न प्रकृति है। इससे भिन्न मेरी एक दूसरी, जीव-रूप परा (उच्च) प्रकृति को जानो, जिसके द्वारा यह संपूर्ण जगत् धारण किया जाता है
लोकप्रिय गीता श्लोक
- गीता 2.47 – कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु
- गीता 18.66 – सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं
- गीता 4.7 – यदा यदा हि
- गीता 4.8 – परित्राणाय साधूनां विनाशाय
- गीता 2.14 – मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः
- गीता 2.20 – न जायते म्रियते
- गीता 2.22 – वासांसि जीर्णानि यथा
- गीता 2.63 – क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः
- गीता 3.35 – श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्
- गीता 6.5 – उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्
- गीता 9.22 – अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये
- गीता 2.48 – योगस्थः कुरु कर्माणि